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नई दिल्ली। मध्य-पूर्व में जारी युद्ध और वैश्विक तनाव का असर अब भारत के दवा बाजार तक पहुंचता दिखाई दे रहा है। दवा उद्योग से जुड़े विशेषज्ञों का कहना है कि दवा निर्माण में उपयोग होने वाले कच्चे माल की कीमतों में तेजी से बढ़ोतरी के कारण आने वाले समय में कई जरूरी दवाओं के दाम बढ़ सकते हैं। इससे आम लोगों की जेब पर अतिरिक्त बोझ पड़ने की आशंका जताई जा रही है।
जानकारी के अनुसार दवा बनाने में इस्तेमाल होने वाले एक्टिव फार्मास्युटिकल इंग्रेडिएंट्स (API) और विभिन्न सॉल्वेंट्स की कीमतों में हाल के दिनों में 20 से 30 प्रतिशत तक वृद्धि दर्ज की गई है। शिपिंग संकट और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में आई बाधाओं के चलते चीन से आने वाले कच्चे माल की उपलब्धता प्रभावित हो रही है। भारत की फार्मा इंडस्ट्री बड़ी मात्रा में इन आयातित कच्चे माल पर निर्भर है, जिससे उत्पादन लागत में दबाव लगातार बढ़ रहा है।
उद्योग से जुड़े सूत्रों के मुताबिक कंटेनर जहाजों की कमी और ढुलाई शुल्क में तेज उछाल के कारण आयात लागत दोगुनी तक हो गई है। कंपनियों को प्रति शिपमेंट हजारों डॉलर का अतिरिक्त सरचार्ज देना पड़ रहा है। इसका सीधा असर दवा निर्माण की लागत पर पड़ रहा है, जो आगे चलकर बाजार कीमतों में बढ़ोतरी का कारण बन सकता है।
आंकड़ों के अनुसार ग्लिसरीन और पैरासिटामोल जैसे अहम कच्चे पदार्थों की कीमतों में भी उल्लेखनीय बढ़ोतरी हुई है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि अंतरराष्ट्रीय हालात जल्द सामान्य नहीं होते, तो पैरासिटामोल सहित कई आवश्यक दवाओं की कीमतों में बढ़ोतरी तय मानी जा रही है।
इसी बीच फार्मा उद्योग से जुड़े संगठनों ने सरकार से सीमित मूल्य वृद्धि की अनुमति देने की मांग भी शुरू कर दी है, ताकि उत्पादन लागत और बाजार संतुलन बनाए रखा जा सके