देशभर में राष्ट्रीय राजमार्गों और एक्सप्रेसवे पर बढ़ते सड़क हादसों, अवैध अतिक्रमण और गैरकानूनी पार्किंग को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने सख्त रुख अपनाया है। अदालत ने यात्री सुरक्षा को संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार का अहम हिस्सा बताते हुए कई महत्वपूर्ण अंतरिम निर्देश जारी किए हैं। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि हाई-स्पीड एक्सप्रेसवे प्रशासनिक लापरवाही और कमजोर ढांचागत व्यवस्थाओं के कारण “खतरे का गलियारा” नहीं बन सकते।
अदालत ने राष्ट्रीय राजमार्गों के राइट ऑफ वे में आने वाले सभी अवैध अतिक्रमण—जैसे ढाबे, भोजनालय और अन्य व्यावसायिक निर्माण—को हटाने का आदेश दिया है। जिला मजिस्ट्रेटों को 60 दिनों के भीतर कार्रवाई पूरी करने के निर्देश दिए गए हैं। साथ ही, भविष्य में बिना भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण या लोक निर्माण विभाग की मंजूरी के कोई लाइसेंस या एनओसी जारी नहीं होगी। मौजूदा लाइसेंसों की 30 दिनों के भीतर समीक्षा करने को कहा गया है।
यह सख्ती राजस्थान के फलोदी और तेलंगाना के रंगारेड्डी में नवंबर 2023 में हुए भीषण सड़क हादसों के बाद सामने आई है, जिनमें 34 लोगों की जान गई थी। कोर्ट ने कहा कि सुरक्षित वातावरण सुनिश्चित करना राज्य की जिम्मेदारी है।
सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण को 60 दिनों के भीतर हर 75 किलोमीटर पर एंबुलेंस और रिकवरी क्रेन तैनात करने का निर्देश दिया है। इसके साथ ही वे-साइड सुविधाओं में विश्राम स्थल, भोजन, शौचालय, सुरक्षित पार्किंग और स्पष्ट संकेतक अनिवार्य किए गए हैं। सभी 4 और 6 लेन हाईवे पर एडवांस ट्रैफिक मैनेजमेंट सिस्टम लागू करने के निर्देश भी दिए गए हैं।
अदालत ने सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय और एनएचएआई को 45 दिनों के भीतर दुर्घटना संभावित ब्लैकस्पॉट की सूची जारी करने को कहा है, जहां लाइटिंग, कैमरे और चेतावनी संकेत लगाए जाएंगे। इसके अलावा केंद्र सरकार को अंतरराज्यीय समन्वय समिति पर भी विस्तृत रिपोर्ट पेश करने के निर्देश दिए गए हैं।
गौरतलब है कि यह आदेश संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत 13 अप्रैल को पारित किया गया है, जिससे इसे तत्काल प्रभाव से लागू करने का रास्ता साफ हो गया