नई दिल्ली। भारतीय लोकतंत्र के लिए आज का दिन बेहद अहम माना जा रहा है। संसद के विशेष सत्र (16 से 18 अप्रैल) के दौरान केंद्र सरकार तीन बड़े विधेयक पेश करने जा रही है, जिनमें महिला आरक्षण से जुड़ा प्रस्ताव सबसे अधिक चर्चा में है। सरकार का उद्देश्य इन विधेयकों के जरिए राजनीतिक ढांचे में व्यापक बदलाव लाना और महिलाओं की भागीदारी को मजबूती देना है।
लोकसभा में कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल इन विधेयकों को पेश करेंगे, जबकि गृह मंत्री अमित शाह इस पर होने वाली चर्चा की अगुवाई करेंगे। इन विधेयकों पर विचार-विमर्श के लिए करीब 18 घंटे का समय निर्धारित किया गया है। सरकार की कोशिश है कि विशेष सत्र के भीतर ही इन्हें पारित कराया जाए, हालांकि विपक्ष ने इसके विरोध में रणनीति तैयार कर ली है।
सरकार द्वारा पेश किए जाने वाले प्रमुख विधेयकों में संविधान (131वां संशोधन) विधेयक 2026 शामिल है, जिसके तहत महिला आरक्षण को आगामी जनगणना से अलग करने का प्रस्ताव रखा गया है। इसके अलावा परिसीमन विधेयक 2026 के जरिए 2011 की जनगणना के आधार पर नए सिरे से लोकसभा और विधानसभा क्षेत्रों का निर्धारण करने के लिए परिसीमन आयोग के गठन की बात कही गई है। तीसरा, केंद्र शासित प्रदेश कानून (संशोधन) विधेयक 2026 है, जिसका उद्देश्य दिल्ली, जम्मू-कश्मीर और पुडुचेरी की विधानसभाओं में भी महिला आरक्षण लागू करना है।
इन विधेयकों के साथ सरकार लोकसभा की कुल सीटों को 543 से बढ़ाकर 850 करने का प्रस्ताव भी रख रही है। प्रस्ताव के अनुसार, 815 सीटें राज्यों और 35 सीटें केंद्र शासित प्रदेशों के लिए निर्धारित होंगी। इनमें से एक-तिहाई सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित होंगी, जिससे करीब 273 महिला सांसदों के संसद में पहुंचने का मार्ग प्रशस्त हो सकता है।
सरकार का कहना है कि ये कदम महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी को नई दिशा देंगे और लंबे समय से लंबित मांग को पूरा करेंगे। वहीं, विपक्ष ने इन प्रस्तावों पर कई सवाल खड़े किए हैं। कांग्रेस, डीएमके और टीएमसी जैसे दलों का कहना है कि वे महिला आरक्षण के खिलाफ नहीं हैं, लेकिन परिसीमन की प्रक्रिया और सीटों के पुनर्वितरण को लेकर गंभीर चिंताएं हैं।
विपक्ष का तर्क है कि 2011 की जनगणना के आधार पर परिसीमन करने से दक्षिण भारत के राज्यों का प्रतिनिधित्व प्रभावित हो सकता है, जबकि उत्तर भारत के राज्यों को अपेक्षाकृत अधिक लाभ मिलेगा। इसी मुद्दे को लेकर विपक्षी दल एकजुट नजर आ रहे हैं और सरकार पर जल्दबाजी में राजनीतिक लाभ लेने का आरोप लगा रहे हैं।
विशेष सत्र से पहले विपक्षी नेताओं की बैठक में इस मुद्दे पर व्यापक चर्चा हुई और संसद में सरकार को घेरने की रणनीति बनाई गई। ऐसे में आने वाले तीन दिन संसद के भीतर तीखी बहस और राजनीतिक टकराव के गवाह बन सकते हैं।
यदि ये विधेयक पारित हो जाते हैं, तो 2029 के आम चुनाव से पहले महिला आरक्षण लागू होने की संभावना जताई जा रही है। यह बदलाव न केवल संसद की संरचना को प्रभावित करेगा, बल्कि भारतीय राजनीति में महिलाओं की भागीदारी को भी एक नई दिशा देगा।