STAR NEWS 24, रईस अल्वी वरिष्ठ पत्रकार
लखनऊ। उत्तर प्रदेश पुलिस की एक डीएसपी सौम्या अस्थाना के कथित मौखिक आदेश को लेकर कानूनी और संवैधानिक बहस छिड़ गई है। चर्चा है कि उन्होंने निर्देश दिया कि “मेरे किसी भी थाने के अंदर अगर पत्रकार ने वीडियोग्राफी की, तो तुरंत मुकदमा दर्ज होगा।” इस कथित बयान के बाद पत्रकार संगठनों और विधि विशेषज्ञों ने सवाल उठाए हैं कि क्या ऐसा आदेश संविधान और कानून से ऊपर हो सकता है?
कानूनी जानकारों का कहना है कि भारतीय संविधान का अनुच्छेद 19(1)(a) नागरिकों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता देता है, जिसमें प्रेस की स्वतंत्रता का मूल आधार निहित है। हालांकि यह अधिकार पूर्ण नहीं है और अनुच्छेद 19(2) के तहत युक्तिसंगत प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं, लेकिन वे स्पष्ट कानूनी आधार पर ही होने चाहिए।
विशेषज्ञों के अनुसार, थाना एक सार्वजनिक कार्यालय है, जहां पारदर्शिता और जवाबदेही महत्वपूर्ण मानी जाती है। यदि कोई पत्रकार सार्वजनिक हित में सूचना संकलन करता है, तो उसे केवल वैध और स्पष्ट कानूनी प्रावधान के तहत ही रोका जा सकता है। बिना किसी विशिष्ट कानूनी धारा का उल्लेख किए सिर्फ मौखिक आदेश के आधार पर एफआईआर दर्ज करना मनमानी की श्रेणी में आ सकता है।
फिलहाल इस कथित आदेश को लेकर आधिकारिक स्पष्टीकरण सामने आना बाकी है। लेकिन इस मुद्दे ने एक बार फिर यह बहस तेज कर दी है कि कानून का शासन संविधान से चलता है, न कि व्यक्तिगत आदेशों से।