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रिपोर्ट: रईस अल्वी, वरिष्ठ संवाददाता
STAR NEWS 24
“दुश्मन की गोलियों का सामना करेंगे, आजाद ही रहे हैं, आजाद ही रहेंगे।” यह केवल शब्द नहीं, बल्कि मातृभूमि के लिए प्राण न्योछावर करने का अडिग संकल्प था। अमर क्रांतिकारी Chandrashekhar Azad की पुण्यतिथि 27 फरवरी को देशभर में श्रद्धा और गर्व के साथ मनाई गई।
23 जुलाई 1906 को मध्य प्रदेश के अलीराजपुर जिले के भाबरा में जन्मे चंद्रशेखर तिवारी बचपन से ही निर्भीक स्वभाव के थे। किशोरावस्था में वे Mahatma Gandhi के असहयोग आंदोलन से जुड़े। गिरफ्तारी के बाद जब मजिस्ट्रेट ने नाम पूछा, तो उनका जवाब था—“नाम: आजाद, पिता का नाम: आजादी, पता: जेलखाना।” 15 कोड़ों की सजा के दौरान भी उनके मुख से “भारत माता की जय” का उद्घोष गूंजता रहा। यहीं से वे चंद्रशेखर तिवारी से चंद्रशेखर आजाद बन गए।
HSRA के रणनीतिकार
चौरी-चौरा कांड के बाद आंदोलन वापसी के निर्णय ने उन्हें सशस्त्र क्रांति की राह पर अग्रसर किया। उन्होंने Bhagat Singh और अन्य साथियों के साथ मिलकर हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन (HSRA) को सशक्त बनाया। संगठन का उद्देश्य क्रांतिकारी तरीकों से गणतांत्रिक भारत की स्थापना था। आजाद रणनीति बनाने, युवाओं को जोड़ने और अंग्रेजों को चकमा देने में माहिर थे।
काकोरी कांड के बाद भी रहे अडिग
Kakori train action के बाद अंग्रेजों ने व्यापक धरपकड़ की, लेकिन आजाद उनके हाथ नहीं आए। 27 फरवरी 1931 को इलाहाबाद (अब प्रयागराज) के अल्फ्रेड पार्क में पुलिस ने उन्हें घेर लिया। भीषण मुठभेड़ के बाद, जब बच निकलने का कोई मार्ग नहीं बचा, तो उन्होंने अंतिम गोली स्वयं को मारकर अपने प्रण को निभाया—अंग्रेज उन्हें जीवित नहीं पकड़ सके। आज वही स्थान चंद्रशेखर आजाद पार्क के नाम से जाना जाता है।
आत्मसम्मान और बलिदान की मिसाल
आजाद केवल क्रांतिकारी नहीं, बल्कि आत्मसम्मान की जीवित प्रतिमूर्ति थे। उनका जीवन सिखाता है कि स्वतंत्रता त्याग, साहस और अटूट संकल्प का परिणाम है।
आज जब पूरा देश स्वतंत्र भारत की हवा में सांस ले रहा है, तो उसमें उन अमर बलिदानियों की महक समाई है, जिन्होंने अपना सर्वस्व राष्ट्र को अर्पित कर दिया।
— STAR NEWS 24 | खबरों का साथी