जस्टिस यशवंत वर्मा का इस्तीफा: नकदी प्रकरण और महाभियोग के बीच राष्ट्रपति को सौंपा त्यागपत्र


जस्टिस यशवंत वर्मा ने अपने पद से इस्तीफा देते हुए राष्ट्रपति को त्यागपत्र सौंप दिया है। यह कदम ऐसे समय में सामने आया है, जब उनके खिलाफ चल रही महाभियोग प्रक्रिया अंतिम चरण में पहुंच चुकी थी।
यह मामला 14 मार्च 2025 का है, जब दिल्ली स्थित उनके सरकारी आवास में आग लगने के बाद एक कक्ष से अधजली नकदी मिलने का दावा किया गया था। उस समय वे अपनी पत्नी के साथ भोपाल में थे। इस घटना के बाद न्यायिक और प्रशासनिक स्तर पर गंभीर सवाल उठे और जांच शुरू की गई।
आरोपों की गंभीरता को देखते हुए संसद में उनके खिलाफ महाभियोग की प्रक्रिया शुरू हुई। अगस्त 2025 में ओम बिरला ने 146 सांसदों के हस्ताक्षर के साथ प्रस्ताव स्वीकार किया, जिसके बाद तीन सदस्यीय जांच समिति का गठन किया गया। समिति ने अपनी रिपोर्ट में आरोपों को गंभीर माना और आगे की कार्रवाई के लिए रिपोर्ट राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री कार्यालय को भेज दी गई।
इससे पहले सर्वोच्च न्यायालय के कॉलेजियम ने उनके तबादले की सिफारिश इलाहाबाद हाईकोर्ट के लिए की थी। आंतरिक जांच में भी आरोप काफी हद तक सही पाए गए थे। जस्टिस वर्मा ने इस जांच को चुनौती दी थी, लेकिन अदालत ने इसे खारिज कर दिया।
अब उनके इस्तीफे के बाद यह मामला नए मोड़ पर पहुंच गया है और आगे की संवैधानिक प्रक्रिया पर सभी की नजरें टिकी हुई हैं। यह घटनाक्रम न्यायपालिका की पारदर्शिता और जवाबदेही को लेकर बड़ी बहस का कारण बन गया है।

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