मध्य-पूर्व में लंबे समय से जारी तनाव के बीच अमेरिका ने ईरान के सामने 15 सूत्रीय कूटनीतिक प्रस्ताव रखकर वैश्विक राजनीति में नई हलचल पैदा कर दी है। इस प्रस्ताव का मकसद दोनों देशों के बीच बढ़ते टकराव को रोकना, परमाणु गतिविधियों पर नियंत्रण पाना और क्षेत्र में स्थिरता बहाल करना बताया जा रहा है। जानकारी के मुताबिक यह प्रस्ताव सीधे तौर पर नहीं, बल्कि मध्यस्थ देशों के जरिए ईरान तक पहुंचाया गया है।
इस प्रस्ताव की सबसे अहम शर्त ईरान के परमाणु कार्यक्रम से जुड़ी है। अमेरिका चाहता है कि ईरान अपने तीन प्रमुख न्यूक्लियर ठिकानों को बंद करे और किसी भी प्रकार के यूरेनियम एनरिचमेंट को तुरंत रोक दे। साथ ही ईरान के पास मौजूद सभी एनरिच्ड परमाणु सामग्री को अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) को सौंपने की बात कही गई है। प्रस्ताव में यह भी मांग की गई है कि IAEA को ईरान के सभी संदिग्ध परमाणु ठिकानों पर बिना किसी रोक-टोक के जांच करने की पूरी अनुमति दी जाए।
यह प्रस्ताव सिर्फ परमाणु कार्यक्रम तक सीमित नहीं है। इसमें ईरान के बैलिस्टिक मिसाइल प्रोग्राम पर भी नियंत्रण लगाने की बात कही गई है। अमेरिका चाहता है कि ईरान अपनी सैन्य क्षमताओं को केवल आत्मरक्षा तक सीमित रखे और भविष्य में मिसाइल क्षमता पर स्पष्ट सीमा तय करे। इसके अलावा प्रस्ताव में एक महीने के युद्धविराम (सीजफायर) का सुझाव भी दिया गया है, ताकि दोनों देश बातचीत के लिए समय निकाल सकें और तनाव कम हो सके।
अमेरिका ने ईरान से यह भी मांग की है कि वह मध्य-पूर्व में सक्रिय अपने प्रॉक्सी समूहों को समर्थन देना बंद करे। इसमें फंडिंग और हथियारों की सप्लाई रोकने पर विशेष जोर दिया गया है। माना जाता है कि यही प्रॉक्सी नेटवर्क क्षेत्र में अस्थिरता का बड़ा कारण रहा है।
वैश्विक व्यापार को ध्यान में रखते हुए अमेरिका ने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को पूरी तरह खुला रखने की भी शर्त रखी है। यह समुद्री मार्ग दुनिया के सबसे अहम तेल सप्लाई रूट्स में से एक है, जहां किसी भी तरह की रुकावट का असर पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है।
इस प्रस्ताव में “गाजर और डंडा” दोनों की रणनीति अपनाई गई है। यदि ईरान सभी शर्तों को मान लेता है तो उस पर लगे न्यूक्लियर से जुड़े अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंध हटा दिए जाएंगे। इतना ही नहीं, अमेरिका ईरान को सिविल न्यूक्लियर प्रोग्राम विकसित करने में मदद करने को भी तैयार है, जिससे ईरान अपने ऊर्जा क्षेत्र, खासतौर पर बिजली उत्पादन, को मजबूत कर सके।
हालांकि यह प्रस्ताव शांति की दिशा में एक बड़ा कूटनीतिक प्रयास माना जा रहा है, लेकिन जमीनी स्थिति अब भी जटिल बनी हुई है। दोनों देशों के बीच अविश्वास गहरा है और हाल के घटनाक्रमों ने स्थिति को और पेचीदा बना दिया है। पाकिस्तान, तुर्की और मिस्र जैसे देश इस पूरे मामले में मध्यस्थ की भूमिका निभा रहे हैं, लेकिन किसी अंतिम समझौते तक पहुंचना अभी आसान नहीं दिख रहा।